कुकुटासन और पाद-मस्तक संयुक्तासन

डॉ मीना अग्रवाल आगरा
नेचुरोपैथी विशेषज्ञ

आपने कई आसनों के बारे में सुना होगा, लेकिन हो सकता है कि कुकुटासन के बारे में न सुना हो। लेकिन मैं आज सभी को कुकुटासन के बारे में विस्तार से बताने जा रही हूँ।

इस आसन को करते समय शरीर की अवस्था ‘कुकुट’ अर्थात् मुर्गे के समान हो जाती है, अतः इस आसन को कुकुटासन कहते हैं।
विधि:

सर्वप्रथम ज़मीन पर पद्मासन की अवस्था में बैठ जाएँ। अब दोनों हाथ अपने दोनों घुटनों के नीचे टाँग एवं जाँघों के जोड़ के बीच से निकालकर नीचे की ओर ले जाएँ। हाथों की हथेलियों और पंजों को बीच से निकालकर ज़मीन पर टिका लें। पंजे एक-दूसरे से विपरीत दिशा में हों। फिर साँस भरकर रोकें। हाथों के बल पर अपना पूरा शरीर ऊपर आकाश की तरफ उठाएँ। सम्पूर्ण शरीर का भार आपके दोनों हाथों पर रहे। जितनी देर तक आसानी से रह सकें रहें। अब साँस को बाहर छोड़ते हुए वापस ज़मीन पर उतर जाएँ। पद्मासन खोल दें, फिर पूरे शरीर को पूर्ण आराम दें और फिर पुनः इस क्रिया को दोहराएँ।
**सावधानियाँ एवं सुझाव:

  • इस आसन की मुद्रा में बैठकर शरीर को एक जगह स्थिर रखें। आगे-पीछे हिलाएँ नहीं । अपना संपूर्ण ध्यान मस्तिष्क की ओर केन्द्रित करने का प्रयास करें। इस आसन में प्राणायाम साधकर आसन करना अधिक लाभकारी रहता है। यदि प्राणायाम का अभ्यास न हो, तो आसन करते समय कभी-कभी नाक से धीरे-धीरे साँस ले सकते हैं। लेकिन साँस को नाक के द्वारा ही बाहर निकालना चाहिए न कि मुँह के द्वारा। लाभ:
    इससे रक्त शोधन (Blood purification) होता है और आलस्य दूर होता है। शरीर में स्फूर्ति एवं बल मिलता है। बाँहें, कंधे और पंजों के साथ पीठ की मांसपेशियाँ मजबूत और लचीली होती हैं। पेट की चर्बी दूर होती है और जठराग्नि प्रदीप्त होती है। भूख बढ़ती है। शरीर का सम्पूर्ण भार हाथों की उंगलियों तथा हथेलियों पर पड़ता है, अतः ये अधिक शक्तिशाली होने लगती हैं। इसके अभ्यास से वक्षस्थल (Chest) तथा भुजाओं की पेशियाँ मजबूत होती हैं।**
    भगंदर तथा बवासीर** जैसे रोगों से मुक्ति मिलती है। आमाशय के सम्पूर्ण विकार दूर होते हैं। रीढ़ की हड्डी शक्तिशाली बनती है। सीना आगे की ओर निकलने लगता है और फेफड़े अधिक शक्तिशाली होते हैं। जाँघ और पिंडलियों को बल मिलता है।

पाद-मस्तक संयुक्तासन (Pada-Mastaka Sanyuktasana)

अब पाद-मस्तक संयुक्तासन के बारे में बताने जा रही हूँ। इस आसन में पाँव के तलवे सिर से मिला दिये जाते हैं, इसलिए इसका नाम ‘पाद-मस्तक संयुक्तासन’ है।

विधि:

समतल भूमि पर दरी या कंबल बिछाकर पेट के बल औंधे लेट जाएँ।पैर और पंजे आपस में जुड़े रहने चाहिए। हाथों की हथेलियाँ भूमि पर टिकाकर नाभि से ऊपर का भाग ऊपर उठाएँ। सिर को जितना पीछे ले जा सकें ले जाएँ। इसके बाद पैरों को ऊपर उठाकर नितम्बों की ओर लाएँ और उन्हें सिर के साथ स्पर्श कराएँ। सिर को पीछे लगाकर पैर के पंजों और तलवों पर टिका दें। नाभि से लेकर घुटनों तक का भाग धरती से लगा रहना चाहिए।

यह एक कठिन आसन है। धीरे-धीरे ही इसमें पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करें। शरीर के साथ किसी भी प्रकार की ज़बरदस्ती न करें, अन्यथा हानि हो सकती है।

लाभ:* इस आसन से रीढ़, पीठ, गुर्दे, पेड़ू, पेट, हाथ-पैर और गर्दन का अच्छा व्यायाम हो जाता है। पाचन शक्ति बढ़ती है और आँतों का खिंचाव होने से मल-त्याग आसानी से होता है। शरीर में होने वाले दर्द समाप्त हो जाते हैं। मधुमेह (Diabetes) के रोग में आशातीत लाभ होता है। वात, पित्त, कफ और विकारों को नष्ट करता है।इस आसन को करने से युवक प्रमेह जैसे रोगों से बच जाते हैं।
स्त्रियों के आमाशय तथा मूत्राशय सम्बन्धी रोग नष्ट होते हैं।
स्त्रियों की छाती (Chest) सुडौल होती है और मुख पर कान्ति आती है।

विशेष: इस आसन का विशेष लाभ लेने के लिए इसे प्राणायाम के साथ करना चाहिए।

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