पवन प्रभात फतेहपुर। जहां ज्ञान की गंगा बहनी थी, वहां व्यापार का जाल बिछा दिया, गरीब की पहुंच से शिक्षा को, कोसों दूर भगा दिया। आज के दौर में विद्या के मंदिर कहे जाने वाले स्कूल तेजी से मुनाफे की दुकानों में तब्दील हो रहे हैं। एक तरफ जहां शासन हर बच्चे को शिक्षित करने के लिए करोड़ों की योजनाएं चला रहा है, वहीं दूसरी ओर निजी स्कूल संचालकों की मनमानी ने शिक्षा को एक फलते-फूलते कारोबार का रूप दे दिया है। आलम यह है कि पंजीयन और खेल मैदान जैसे 35 कड़े मानकों को ताक पर रखकर गली-मोहल्लों में धड़ल्ले से स्कूल खोले जा रहे हैं, जिन्हें विभागीय सांठगांठ से मान्यता भी मिल जाती है। हैरानी की बात यह है कि सरकारी स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षकों और मुफ्त सुविधाओं (भोजन, ड्रेस, जूते-मोजे) के बावजूद छात्र संख्या सिमट रही है, जबकि बुनियादी सुविधाओं जैसे शौचालय और खेल के मैदान से विहीन निजी स्कूलों में अभिभावकों से हजारों रुपये की वसूली की जा रही है। मोटी फीस वसूलने के बावजूद ये स्कूल बच्चों को छत पर खेलने को मजबूर कर रहे हैं। शिक्षा के इस बिजनेस मॉडल ने न केवल मध्यमवर्गीय परिवारों को असहाय बना दिया है बल्कि गरीब मजदूर और किसान के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दरवाजे लगभग बंद कर दिए हैं। प्रशासन की चेतावनी के बावजूद धरातल पर नियमों की धज्जियाँ उड़ाते ये विद्यालय आज समाज के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं।मानकों पर नहीं रहते खरेस्कूल खोलने के लिए समिति का पंजीयन, रजिस्टार फर्म एंड सोसायटी का पंजीयन, खेल का मैदान सहित 35 ऐसे मानकों का पालन करना होता है, जो किसी भी सूरत में आसान नहीं है। मानकों का पालन करने के बाद ही स्कूल खुल पाते हैं, लेकिन क्षेत्र में गली गली में खुले स्कूलों में कोई भी मानक नहीं दिखाई पड़ रहे हैं। इन स्कूलों में शिक्षा को व्यवसाय बना कर संचालक अपनी जेबें भर रहे हैं।सरकारी में चार तो प्राइवेट स्कूल में 400 बच्चेसबसे चौकाने वाली बात यह है कि सरकारी स्कूलों में भोजन, ड्रेस, फल, दूध, जूता मोजा सहित कॉपी, किताब के साथ बस्ता, आरओ पानी, बिजली पंखे आदि का खर्च सरकार उठा रही है। साथ ही अनुभवी एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की भी व्यवस्था है। लेकिन किसी क्लास में चार तो किसी क्लास में 14 बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। वहीं बिजनेस वाले विद्यालयों में बच्चों की संख्या एक एक क्लास में लगभग 50 छात्रों से कम नहीं है। पहली कक्षा के छात्र से एडमीशन के समय विभिन्न शुल्क बता कर लगभग पांच हजार रुपए उसके बाद प्रतिमाह एक हजार रुपए से लेकर दो हजार रुपए तक अभिभावकों से वसूला जाता है।अधिक फीस पर भी सुविधाएं नहींसंचालक गली-मोहल्लों में स्कूल खोलकर अभिभावकों से फीस के तौर पर मोटी रकम तो ऐंठ रहे हैं, लेकिन छात्रों को सुविधा नाम की चीज नहीं मिल पा रही है। हद तो तब होती है जब छात्रों के लिए न तो बैठने के लिए पर्याप्त व्यवस्था होती है और न ही स्कूल में शौचालय की व्यवस्था रहती है। स्कूल संचालकों के पास सबसे बड़ी समस्या खेल मैदान की होती है। खेल मैदान नहीं होने से कई स्कूल के छात्र भवन की छत में ही जैसे तैसे काम चलाते हैं।
तो वही राकेश कुमार, डीआईओएस ने बताया कि
राजकीय विद्यालयों के आंकड़े 2126 परिषदीय विद्यालय हैं पूरे जिले में403 माध्यमिक विद्यालय जिले में किए जा रहे हैं। सभी बोर्डों से संचालित विद्यालयों के प्रधानाचार्यो को निर्देशित किया जा चुका है कि अभिभावकों को परेशान न किया जाए। स्कूल से कॉपी-किताब, यूनीफार्म न बेची जाए अन्यथा कार्रवाई तय है।
